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पूसा कृषि संस्थान ने धान की तीन नई उन्नत किस्मों को बनाया रोग मुक्त

  • जीवाणु झुलसा रोग व ब्लास्ट रोग से किसानों को मिली राहत
  • पूसा बासमती-1847, पूसा बासमती-1885 और पूसा बासमती-1886

नई दिल्ली, 30 सितंबर 2022 : देश के किसानों को धान की नई उन्नत किस्मों पूसा बासमती-1847, पूसा बासमती-1885 और पूसा बासमती-1886 में दो रोगों जैसे जीवाणु झुलसा रोग व ब्लास्ट रोग से राहत मिल गई है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा) में शुक्रवार को आयोजित प्रेसवार्ता में पूसा संस्थान के निदेशक डॉ ए. के. सिंह ने यह जानकारी दी। डॉ. सिंह ने बताया कि बासमती चावल की तीन उन्नत किस्में पूसा बासमती-1847, पूसा बासमती-1885 और पूसा बासमती-1886 जीवाणु झुलसा रोग व ब्लास्ट रोग के प्रतिरोध के साथ, दुनिया भर में बासमती चावल निर्यात में भारत के नेतृत्व को बनाए रखने का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

डॉ. सिंह ने बताया कि गत तीन दिवसीय किसान संपर्क यात्रा में उन्होंने इन तीन किस्मों को लेकर दिल्ली व अन्य प्रदेशों के किसानों से संपर्क कर उनकी प्रतिक्रिया जानी जिसके चलते पूसा संस्थान को बेहतर परिणाम मिले हैं। इसके लिए निदेशक डॉ. सिंह ने अपने कृषि वैज्ञानिकों के कार्य की सराहना भी की है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और पूसा संस्थान, नई दिल्ली ने समेकित अनुसंधान के माध्यम से इन तीन प्रमुख किस्मों पूसा बासमती- 1121, पूसा बासमती-1509 और पूसा बासमती- 6 को आणविक मार्कर सहायक प्रजनन की सहायता से इन दोनों रोगों से मुक्त करने के लिए चावल की उन्नत किस्में विकसित की। जिसके परिणामस्वरूप पूसा बासमती-1847, पूसा बासमती-1885 और पूसा बासमती-1886 का विकास और विमोचन हुआ।

  • धान की खेती के तहत 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र पर होती है
    बासमती चावल एक निर्यात की वस्तु है और 2021-22 के दौरान 25,053 करोड रुपये की वार्षिक विदेशी मुद्रा आय हुई। पूसा बासमती चावल की किस्में, पूसा बासमती-1121, पूसा बासमती-1509 और पूसा बासमती- 6 भारत में बासमती चावल के जीआई क्षेत्र में बासमती चावल की खेती के तहत 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र पर होती है और 90 प्रतिशत से अधिक बासमती चावल का भारत से निर्यात होता है।
  • धान में सबसे विनाशकारी रोग है जीवाणु झुलसा रोग व ब्लास्ट रोग
    बासमती चावल में जीवाणु झुलसा रोग व ब्लास्ट रोग सबसे विनाशकारी रोग हैं जो महत्वपूर्ण उपज हानि के साथ-साथ बासमती अनाज और खाना पकाने की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। परंपरागत रूप से, इन रोगों का प्रबंधन स्ट्रेप्टोसाइक्लिन और ट्राईसाइक्लाज़ोल जैसे रसायनों के उपयोग से किया जाता है। हालाँकि, आयात करने वाले देशों द्वारा विशेष रूप से यूरोपीय संघ से बासमती चावल में कुछ रसायनों के उपयोग के बारे में चिंता व्यक्त की गई है, और कुछ मामलों में आयातकों से बासमती चावल की खेप को अस्वीकार कर दिया गया है।
  • आंधी व तूफान में भी बेहतर रहती है 1847 किस्म
    पूसा बासमती-1847 लोकप्रिय बासमती चावल की किस्म है और यह पूसा बासमती-1509 की उन्नत व जीवाणु झुलसा रोग व ब्लास्ट रोग प्रतिरोधी किस्म है। डॉ. सिंह ने बताया कि यह किस्म आंधी व तूफान में भी बेहतर परिणाम देती है। वहीं, पूसा बासमती-1885 लोकप्रिय बासमती चावल की किस्म है और यह पूसा बासमती-1121 का एक उन्नत व उक्त दोनों रोग प्रतिरोधी किस्म है। जबकि पूसा बासमती-1886 लोकप्रिय बासमती चावल की किस्म है और यह पूसा बासमती-6 का एक उन्नत व उक्त दोनों रोग प्रतिरोधी किस्म है। ये तीनों किस्में आणविक मार्कर असिस्टेड ब्रीडिंग के माध्यम से विकसित की गई हैं जिसमें इन रोग प्रतिरोध के लिए दो जीनों को शामिल किया गया है।
  •  0.01 पीपीएम तक कम का विषय चिंताजनक है
    निदेशक डॉ. सिंह ने बताया कि हाल के वर्षों के दौरान, यूरोपीय संघ ने ट्राइसाइक्लाज़ोल (गर्दन विस्फोट रोग के प्रबंधन में सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले कवकनाशी में से एक) के एमआरएल (अवशेष सीमा) को 0.01 पीपीएम तक कम कर दिया है। जो चिंता का विषय है। इसलिए, बासमती चावल के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अग्रणी स्थिति बनाए रखने के लिए इस मुद्दे को संबोधित करने की तत्काल आवश्यकता थी। 

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