Tuesday, May 14, 2024
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अर्द्धांगिनी से कब सर्वांगिनी बन गई, पता हीं नहीं चला

  • “मेरा अर्द्धांगिनी से सर्वांगिनी तक का सफर”
  • विवाह निश्चित हुआ तभी से राधा और केशव का तालमेल अच्छा था
  • कुछ फैसले मन को प्रिय नहीं होते

राधा समझ ही नहीं पाई की कब उसने केशव के समक्ष अर्द्धांगिनी से सर्वांगिनी तक का सफर तय कर लिया। विवाह निश्चित हुआ तभी से राधा और केशव का तालमेल अच्छा था। विवाह हुआ तो राधा अर्द्धांगिनी बन गई। गृहस्थी के जीवन में सारे मनोभाव निहित होते है। हर्ष-विषाद, यश-अपयश सभी के साथ जीवन व्यतीत होता है। प्रारम्भिक समय शायद गृहस्थ जीवन को समझने में लगाना होता है। राधा और केशव के अपने-अपने विश्लेषण थे, पर कुछ विश्लेषण यहाँ एक दूसरे के मन के अनुरूप नहीं थे। परंतु समय बड़ा बलवान होता है। कुछ समय पश्चात केशव को राधा के विश्लेषण की सच्चाई का ज्ञान हुआ। कुछ फैसले मन को प्रिय नहीं होते, समाज की तराजू के अनुरूप भी नहीं होते पर आने वाले समय के लिए हितकर होते है। जीवन दूरगामी दृष्टि को देखकर जीना चाहिए। लोगों की सोच, समाज के मापदंड तो बदलते रहते है। वे तो आपका पद और कद ही देखते है।

बीतते समय के साथ राधा के साथ केशव की मान प्रतिष्ठा और जीवन जीने के तौर-तरीके में भी परिवर्तन आया। वह भी उन्नति के पथ पर अग्रसर होता गया। केशव राधा के प्रयासों से भली-भाँति परिचित हो रहा था। उसके छोटे-छोटे प्रयास केशव के मन में जगह बना रहे थे। कभी-कभी राधा का मन अपने निर्णय पर डगमग भी हुआ, कभी-कभी लोगों के अतिरिक्त मूल्यांकन से मन दुखी भी हुआ। विवेचना और आलोचना के बीच जिंदगी फंसी दिखाई दी, पर सारे निर्णय प्रयोगात्मक थे। व्यावहारिक और यथार्थ धरातल वाले थे। राधा यह जानती थी कि मन का हो तो अच्छा और न हो तो और भी अच्छा। कभी-कभी जीवन का रास्ता अकेले भी तय करना होता है और मंजिल मिलते ही सब लोग हाथ मिलाना शुरू कर देते है। समय के अनुरूप परिणाम देखकर केशव के लिए राधा अर्द्धांगिनी से सर्वांगिनी बन गई। केशव जानता था कि राधा के कुछ निर्णय भविष्य को दृष्टिगत रखकर लिए हुए है। कभी-कभी कड़वे घूँट पीना भी हितकर होता है। लोगों का साथ आलोचना और विवेचना तक होता है उससे आगे नहीं। केशव राधा के मन की अच्छाई और सच्चाई को जानता था। वह हर निर्णय के पीछे उसके मनोभाव को भी जानता था। राधा के साथ केशव भी ऊँचाई की उड़ान की ओर अग्रसर हुआ।

इस लघुकथा से यह शिक्षा मिलती है कि जीवन तथ्यों पर आधारित ज्ञान नहीं है जिसे समाज के मापदण्डों और लोगों की विवेचना के अनुसार रूप दिया जाए। यह तो स्वयं के गहन विश्लेषण और दूरगामी परिणामों पर आधारित होना चाहिए। यदि आप किसी के मन की सच्चाई की थाह हो जानेंगे तो शायद आपकी अर्द्धांगिनी भी कब सर्वांगिनी का रूप धारण कर लेगी यह आपको ज्ञात भी नहीं होगा। हमेशा याद रखिए आपका मूल्यांकन आपकी परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए न कि लोगों की आलोचना और विवेचना को दृष्टिगत रखते हुए। डॉ. रीना रवि मालपानी (कवयित्री एवं लेखिका)

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